जो लोगों की पसंद है वो करना व्यापार है।

जो लोगों की जरुरत है वो करना उपचार है।।

लोगों की जो पसंद होती है, वो उनकी जरुरत नहीं होती।

जो लोगों की जरुरत होती है, वो उनकी पसंद नहीं होती।

 

क्यों? क्योंकि अक्सर उन्हें पता ही नहीं होता कि, उनकी जरुरत क्या है। ज्यादातर लोग खुद सोचने की जगह अंधानुकरण ही करते हैं, परिणामों का अवलोकन किये बगैर। अल्पकालीन और दीर्घकालीन परिणामों के अंतर पर गौर करने की जगह किसी और अक्ल के अंधे का मुंह ताकना आसान लगता है, आमलोगों को…
अक्सर पूंजीपति वर्ग, अपनी कुत्सित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, उन्हें भरमाये रहता है। हम जानते हैं कि, सारा प्रचार तंत्र पूंजीपतियों के अधीन है, जिनमें से अधिकांश अपने तुच्छ स्वार्थ की पूर्ति के लिए या अज्ञानतावश किसी भी हद तक गिर सकते हैं।
तो आइये, हम मूल विषय पर लौटते हैं।

आखिर लोगों की जरुरत क्या है और उन्हें पसंद क्या है?

संघर्ष ही जरुरत है और पलायन ही पसंद है।

उदहारण के लिए आपने इल्ली और तितली वाली कहानी सुनी होगी, जिसमें इल्ली के अकथनीय संघर्ष को देखकर, एक छात्र को दया आ गयी और उसने झिल्ली को फाड़कर इल्ली की मदद कर दी और बाहर निकलते ही इल्ली की मृत्यु हो गयी। प्रोफेसर जो छात्रों केवल देखते रहने और छूने से मना करके बाहर गए हुए थे, वापस लौटने पर लज्जित छात्र को समझाए कि, तूने इस पर दया नहीं की बल्कि, इसकी हत्या कर दी। तुमने इसका संघर्ष छीन लिया जो इसके फेफड़ों, डैनों और अन्य अंगों के विकास के लिए, आवशयक था। उसी संघर्ष से इसे बाहरी दुनिया में जीने के लायक “शक्ति” मिलने वाली थी।

याद रखिये, “संघर्ष से ही शक्ति मिलती है”।

ठीक इसी प्रकार, जब किसी को बुखार या कोई अन्य तीव्र रोग (acute diseases) होते हैं, जो अक्सर तात्कालिक होते हैं, तो हमें संघर्ष के लक्षण दिखाई देते हैं। आम तौर पर, बिना दवा के ही, कुछ परहेजों से ही ये लक्षण कुछ घंटों या दिनों में स्वयं समाप्त हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास हो जाता है, जो आने वाले कई जीर्ण रोगों (chronic diseases) से बचाता है।

लेकिन होता क्या है?

लोग रोगों को दबाने वाली चिकित्सा (palliative treatment) करते हैं जो तत्काल तो बहुत ही पसंद आता है, लेकिन बाद में बहुत ही नापसंद परिणाम आते हैं।
रोगों को दबाते दबाते एक सीमा के बाद जब और दबाना संभव नहीं होता तो “रोगों को बाहर निकलने वाली चिकित्सा” (curative treatment) की ओर लौटना ही पड़ता है। तबतक बहुत ही देर हो चुकी होती है और एक एक करके दबे हुए रोगों को बाहर निकालने में समय लगना स्वाभाविक ही है। लेकिन होता यह है कि, एक तो रोगी का धैर्य समाप्त हो चुका होता है और उसका तन-मन-धन तीनों कमजोर पड़ चुका होता है। ऊपर से जिस संघर्ष से उसे भागने की आदत पड़ चुकी होती है, उसी से उसे लगातार गुजरना पड़ता है।
यह स्थिति चिकित्सक के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है। एक तो सत्य को समझना मुश्किल होता है, ऊपर से समझाना तो और भी मुश्किल। रोगी की स्थिति भी ऐसी होती है कि, वह “अनुचित अपेक्षा” रखता है, जो संसार के सभी दुखों का एकमात्र कारण है।
निष्कर्ष यह कि, जो चिकित्सा लोगों को पसंद है, वो रोगों को दबाने वाली चिकित्सा अर्थात palliative treatment है और जो लोगों की जरुरत है, वो रोगों को बाहर निकालने वाली चिकत्सा अर्थात curative treatment है।
बेहतर यह है कि, समय रहते जरुरत को पहचान लिया जाय तो यही पसंद में बदल जायेगी
ध्यान रहे, “सत्य वह मार्ग है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है”।